राजस्थान में वन (Forests in Rajasthan)

वन

अंग्रेजी शासन से पहले भारत में जनता द्वारा जंगलों का इस्तेमाल मुख्यतः स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार होता था। भारत में सबसे पहले लार्ड डलहौजी ने 1855 में एक वन नीति घोषित की, जिसके तहत राज्य के वन क्षेत्र में जो भी इमारती लकड़ी के पेड़ हैं वे सरकार के हैं और उन पर किसी व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। ब्रिटिश काल में भारत की पहली राष्ट्रीय वन नीति वर्ष 1894 में प्रकाशित की गई। स्वतंत्रता के पश्चात् 1952 में नई वन नीति बनाई गई। इस वन नीति को 1988 में संशोधित किया गया। इस नीति के अनुसार देश के 33 प्रतिशत भू भाग पर वन होने आवश्यक है।

संविधान के 42वें संशोधन 1976 के द्वारा वनों का विषय राज्यसूची से समवर्ती सूची में लाया गया।

राजस्थान में सर्वप्रथम 1910 में जोधपुर रियासत ने, 1935 में अलवर रियासत ने वन संरक्षण नीति बनाई। राज्य में 1949-50 में वन विभाग की स्थापना की गई। स्वतंत्रता के पश्चात् राजस्थान वन अधिनियम 1953 में पारित किया गया।

राजस्थान वन अधिनियम 1953 के अनुसार वनों को तीन भागों में बांटा गया है।

आरक्षित वन या संरक्षित

इन वनों पर सरकार का पूर्ण स्वामित्व होता है। इनमें किसी वन सम्पदा का दोहन नहीं कर सकते हैं।

सुरक्षित वन या रक्षित

इन वनों के दोहन के लिए सरकार कुछ नियमों के आधार पर छुट देती है।

अवर्गीकृत वन

इन वनों में सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क जमा करवाकर वन सम्पदा का दोहन किया जा सकता है।

राजस्थान सरकार द्वारा 8 फरवरी 2010 में अपनी पहली राज्य वन नीति घोषित की गई है । साथ ही राजस्थान वन पर्यावरण निति घोषित करने वाला देश का पहला राज्य हो गया!

भारतीय वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत 1981 में केन्द्रीय वन अनुसंधान संस्थान देहरादून की स्थापना की गई। इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं – शिमला, कोलकाता, नागपुर एवं बंगलौर। भारतीय वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून की वन रिपोर्ट(फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया, स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट) 2017 के अनुसार, राजस्थान में लगभग 32,737 वर्ग किलोमीटर का वन क्षेत्र दर्ज किया गया है। यह वन क्षेत्र राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 9.57% और भारत के वन क्षेत्र का लगभग 4.28% है। कानूनी स्थिति के आधार पर, सरकार ने इस वन क्षेत्र को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया है:

आरक्षित वन – 12,475 वर्ग। किलोमीटर(38.11%)

संरक्षित वन – 18,217 वर्ग। किलोमीटर(55.64%)

अवर्गीकृत वन – 2,045 वर्ग। किलोमीटर(6.25% )

तथ्य

भारत वन स्थिति रिपोर्ट( आईएसएफआर) 2017 के मुताबिक राजस्थान में कुल 16,572 वर्ग किमी. वन क्षेत्र है। जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.84 प्रतिशत है। राज्य में अत्यंत सघन वन क्षेत्र 78, सामान्य सघन वन 4,340 और खुले वन 12,154 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले है।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में अभिलेखित वन 32,737 वर्ग किमी. है, जो कि इसके कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.57% है। जिसमें संरक्षित वन 18217 किमी (55.64%), आरक्षित वन 12475 किमी (38.11%), अवर्गीकृत 2045 (6.25%

वन क्षेत्र बढ़ाने के मामले में राजस्थान देश का सातवां राज्य है। पहली बार भारतीय वन सर्वे ने राज्य के 33 जिलों में वन क्षेत्र का आंकलन किया गया है। – इससे पहले केवल 29 जिलों में ही वन क्षेत्र का आंकलन किया जाता रहा है। आंकलन के अनुसार 2015 के 85 वर्गकिलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ने मुकाबले 2017 में में 466 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ गया है।

भारत में सबसे ज्यादा वन मध्यप्रदेश और सबसे कम हरियाणा में हैं।

देश में वन क्षेत्र की दृष्टि से राजस्थान का (कुल राज्य व केंद्रशासित प्रदेश में 36 में से) 9वाँ स्थान है।

राज्य में सर्वाधिक वन उदयपुर में है।

राज्य में न्यूनतम वन चुरू में है तथा इसके बाद हनुमानगढ़ है।

केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन है।

वनों के प्रकार

शुष्क सागवान वन

ये वन बांसवाड़ा, चितौड़गढ़, प्रतापगढ़, उदयपुर, कोटा तथा बारां में मिलते है। बांसवाड़ा में सर्वाधिक है। ये कुल वनों का 7 प्रतिशत हैं इन वनों में बरगद, आम,तेंदु,गुलर महुआ, साल खैर के वृक्ष मिलते है।

शुष्क पतझड़ वन

ये वन उदयपुर, राजसमंद, चितौड़गढ़, भीलवाड़ा, सवाई माधापुर व बुंदी में मिलते हैं। ये कुल वनों का 27 प्रतिशत हैं। इन वनों में छोकड़ा, आम, खैर , ढाक, बांस, जामुन, नीम आदि के वृक्ष मिलते हैं।

उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन

ये वन पश्चिमी राजस्थान जोधपुर, बीकानेर, जालौर, सीकर, झुंझनू में मिलते हैं। ये कुल वनों का 65 प्रतिशत हैं इन वनों में बबूल, खेजड़ी, केर, बेर, आदि के वृक्ष मिलते है।

उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन

ये वन केवल माउंट आबू के चारों तरफ ही पाये जाते हैं। ये सघन वन वर्ष भर हरे – भरे रहते है। इन वनो का क्षेत्रफल मात्र 0.4 प्रतिशत है। इन वनों में आम, धाक, जामुन, सिरिस, अम्बरतरी, बेल के वृक्ष मिलते है।

सालर वन – ये वन अलवर, चितौड़गढ़ सिरोही और उदयपुर में मिलते है।इन वनों से प्राप्त लकड़ी सामान की पैकिंग और फर्नीचर उद्योग में काम आती है।

वन सम्पदा

बांस – बांसवाड़ा, चितौड़गढ़, उदयपुर, सिरोही।

कत्था – उदयपुर, चितौडगढ़, झालावाड़, बूंदी, भरतपूर।

तेन्दुपत्ता – उदयपुर, चितौड़गढ़, बारां, कोटा, बूंदी, बांसवाड़ा।

खस – भरतपुर, सवाईमाधोपुर, टोंक।

महुआ – डुंगरपुर, उदयपुर, चितौड़गढ़,झालावाड़।

आंवल या झाबुई – जोधपुर, पाली, सिरोही, उदयपुर।

शहर/मोम – अलवर, भरतपुर, सिरोही, जोधपुर।

गांेंद – बाड़मेर का चैहट्टन क्षेत्र।

तथ्य

तेन्दुपत्ता से बीड़ी बनती है। इसे टिमरू भी कहते है।

खस एक प्रकार की घास है। इससे शरबत, इत्र बनते है।

महुआ से आदिवासी शराब बनाते है।

आंवल चमड़ा साफ करने में काम आती है।

कत्था हांडी प्रणाली से कथौड़ी जाति द्वारा बनाया जाता है। कत्थे के साथ केटेचिन निकलती है जो चमड़े को रंगने में काम आति है।

वानिकी कार्यक्रम

अरावली वृक्षारोपण योजना

अरावली क्षेत्र को हरा भरा करने के लिए जापान सरकार(OECF – overseas economic co. fund) के सहयोग से 01.04.1992 को यह परियोजना 10 जिलों (अलवर,जयपुर,नागौर, झुंझनूं, पाली, सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, दौसा, चितौड़गढ़) में 31 मार्च 2000 तक चलाई गई।

मरूस्थल वृक्षारोपण परियोजना

मरूस्थल क्षेत्र में मरूस्थल के विस्तार को रोकने के लिए 1978 में 10 जिलों में चलाई गई। इस परियोजना में केन्द्र व राज्य सरकार की भागीदारी 75:25 की थी।

वानिकी विकास कार्यक्रम

1995-96 से लेकर 2002 तक जापान सरकार के सहयोग से यह कार्यक्रम 15 गैर मरूस्थलीय जिलों में चलाया गया।

इंदिरा गांधी क्षेत्र वृक्षारोपण परियोजना

सन् 1991 में IGNP किनारे किनारे वृक्षारोपण एवं चारागाह हेतु यह कार्यक्रम जी जापान सरकार के सहयोग से चालाया गया। 2002 में यह पुरा हो गया।

राजस्थान वन एवं जैविक विविधता परियोजना

वनों की बढोतरी के अलावा वन्य जीवों के संरक्षण हेतु यह कार्यक्रम भी जापान सरकार के सहयोग से 2003 में प्रारम्भ किया गया। इन कार्यक्रमों के अलावा सामाजिक वानिकी योजना 85-86, जनता वन योजन 1996, ग्रामीण वनीकरण समृद्धि योजना 2001-02 एवं नई परियोजना (आदिवासी क्षेत्र में वनों को बढ़ाने हेतु) हरित राजस्थान 2009 अन्य वनीकरण के कार्यक्रम है।

तथ्य

पं. राज. के लाठी सिरिज क्षेत्र(भूगर्भीय जल पट्टी) में सेवण प्लसियुरस सिडीकुस, धामन एवं मुरात घासें मिलती है।

राजस्थान में सर्वाधिक धोकड़ा के वन है।

जैसलमेर के कुलधरा में कैक्टस गार्डन विकसित किया जा रहा है।

पलास/ढाक के फूलों से लदा वृक्ष जंगल की आग कहलाता है। इसका वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है।

खेजड़ी केा रेगिस्तान का कल्पवृक्ष कहते है। इसे शमी, जांटी(पंजाबी, हरियाणी, राजस्थानी), छोकड़ा(सिन्धी) , पेयमय(तमिल), बन्नी(कन्नड़), प्रोसोपिस सिनोरिया(विज्ञान) में कहते हैं 1983 में इसे राज्य वृक्ष घोषित किया गया। इसकी पत्तियों को लुम फली को सांगरी कहते है।

रोहिड़ा को मरूस्थल का सागवान, राजस्थान की मरूशौभा, मारवाड़ टीका कहते है।इस पर केसरिया फुल आते हैं। इन फुलों को 1983 में राज्य पुष्प घोषित किया गया। इसका वानस्पतिक नाम टिकोमेला अण्डलेटा है।

पूर्व मुख्य सचिव मीणा लाल मेहता क प्रयासों से झालाना वन खण्ड, जयपुर में स्मृति वन विकसित किया गया है। 20.03.2006 में इसका नाम बदलकर कर्पूर चन्द कुलिस स्मृति वन कर दिया गया है।

जोधपुर में देश का पहला मरू वानस्पतिक उद्यान माचिया सफारी पार्क में स्थापित किया जा रहा है। जिसमे मरू प्रदेश की प्राकृति वनस्पति संरक्षित की जायेगी।

शेखावटी क्षेत्र में घास के मैदान बीड़ कहलाते है।कुमट,कैर, सांगरी, काचरी व गूंदा के फुल पचकूटा कहलाते हैं।

केन्द्र सरकार ने मरूस्थलीकरण को रोकन के लिए अक्टूबर 1952 में मरू. वृक्षारोपण शोध केन्द्र की स्थापना जोधपुर में की थी।

Arid Forest Research Institute आफरी भी जोधुपर में है।

राजसमंद जिले में खमनौर(हल्दीघाटी) व देलवाड़ा क्षेत्र को चंदन वन कहते हैं।

केन्द्र सरकार द्वारा 07.02.2003 कोर राष्ट्रीय वन अयोग का गठन किया गया।

भारतीय वन सर्वेक्षण की स्थापना 1981 में देहरादून में कि गई।

राजस्थान को वन प्रबन्ध हेतु 13 वृत्तों में बांटा गया है।

जोधपुर जिले के खेजड़ली गांव मं 1730 में बिश्नोई समाज के 363 स्त्री पुरूषों ने इमरती देवी बिश्नोई के नेतृत्व में अपने प्राणों की आहुति दे दी।

इसी स्मृति में खेजड़ली गांव में भाद्रपद शुक्ल दशमी को मेला लगता है।

इससे पहले जीवों की रक्षार्थ 1604 में जोधुपर रियासत के रामासड़ी गांव में पहला बलिदान करमा व गौरा दिया गया।

वन संरक्षण, वन अनुसंधान, वन विकास एवं वानिकी लेखन में उत्कृष्ण कार्य करने वाले व्यक्ति या संस्था के लिए 1994-95 में अमृता देवी स्मृति पुरस्कार प्रारम्भ किया गया।

पाली जिले के सोजत सिटी में पर्यावरण पार्क विकसित किया जा रहा है।

वन्य जीव अभ्यारण्य

वन्य जीवों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य

23 अप्रैल 1951 को राजस्थान वन्य-पक्षी संरक्षण अधिनियम 1951 लागु किया गया।

भारत सरकार द्वारा 9 सितम्बर 1972 को वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 लागु किया गया। इसे राजस्थान में 1 सितम्बर, 1973 को लागु किया गया।

42 वां संविधान संशोधन, 1976 के द्वारा वन को राज्य सुची स निकालकर समवर्ती सूची में डाला गया। रणथम्भौर में टाइगर सफारी पार्क बनाया जायेगा।

रेड डाटा बुक में संकटग्रत व विलुप्त जन्तुओं व वनस्पतियों के नाम प्रविष्ट किये जाते हैं।

भारत में बाघ संरक्षण योजना के निर्माता कैलाश सांखला थे। अन्हें Tiger man of india भी कहते हैं। इन्होंने Tiger and return of tiger पुस्तकें भी लिखी।

राष्ट्रीय उद्यान – 3

रणथम्भौर

यह सवाईमाधोपुर जिले में स्थित है। इसका पुराना नाम रण स्तम्भपुर हैं। ये सवांईमाधोपुर के शासकों का आखेट क्षेत्र था। जिसे सन् 1955 में अभयारण्य घोषित कर दिया गया। वन्य जीव सरंक्षण अधिनियम, 1972 के अन्तर्गत सन् 1973 में इसे टाईगर प्रोजेक्ट में शामिल किया गया हैं। राजस्थान का पहला टाईगर प्रोजेक्ट था। 1 नवम्बर 1980 को इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया। यह भारत का सबसे छोटा टाइगर जिरर्व प्रोजक्ट है। इसे Land of tiger भी कहते हैं। बाद्यों के अलावा घड़ीयाल, चीतल, नीलगाय, सांभर, रीछ, जरख अन्य जीव इसमें मिलते हैं। यह राष्ट्रीय उद्यान अरावली और विन्ध्याचल पर्वतमालाओं के बीच में स्थित है। इस राष्ट्रीय उद्यान में रणथम्भौर दुर्ग, जोगीमहल, राजाबाग, गिलाई, त्रिनेत्र गणेश मन्दिर दर्शनिय स्थल हैं ।

इस राष्ट्रीय उद्यान में विश्व बैंक के सहयोग से वन्य जीवों के संरक्षण हेतु 1998 से 2004 तक 6 वर्ष के लिए india eco. dev. project चलाया गया था।

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

यह भरतपुर में है। इसे घाना पक्ष्ी बिहार भी कहते हैं इसे पक्षियों का स्वर्ग कहते हैं। यह एशिया की सबसे बड़ी पक्षी प्रजनन स्थली है।इसे सन् 1956 में अभयारण्य घोषित किया गया था। 1981 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया 1985 में इसे युनेस्को ने विश्व प्राकृतिक धरोहर सूची में डाला।यहां पक्षियों की अनेक प्रजातियां मिलती है। जिसमें से कुछ प्रवासी भी है। प्रवासियों पक्षियों में सबसे प्रमुख साइबेरियन क्रेन(सारस) है। जो यूरोप के साइबेरिया प्रान्त से शीतकाल में यहां आता है। और गीष्म काल में प्रजनन के बाद लौट जाता है। यहां सुर्खाव, अजगर, लाल गरदन वाले तोते आदि मिलते हैं। यहां के पाईथन प्वांइट पर अजगर देखे जा सकते है। यह रा. उ. प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक सलीम अली की कर्मस्थली रहा है। रा. उ. गंभीरी और बाणगंगा के संगम पर है।

मुकुन्दरा हिल्स अभ्यारण्य

यह अभयारण्य कोटा,चितौड़गढ़,बूंदी व झालावाड़ में है। पहले इसका नाम दर्रा था। बाद में 2003 में इसका नाम राजीव गांधी नेशलन पार्क कर दिया गया। अब इसका नाम मुकुन्दरा हिल्स अभ्यारण्य है। इसी अभ्यारण्य में मुकुन्दवाड़ा की पहाड़ीया स्थित है। 1955 में असकी स्थापना हुई। 9 jan 2012 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया। यह अभयारण्य घडीयाल,सारस, गागरोनी तोते के लिए प्रसिद्ध है। यहां जीव जन्तुओं को देखने के लिए अवलोकन स्तम्भ बने हुए हैं। जिसे औदिया कहते है। राज्या में सर्वाधिक जीव इसी अभ्यारण्य में है।

नोट – गागरोन दुर्ग, अबली मीणी महल, रावण महल, भीमचोरी मन्दिर इसी अभयारण्य में है। मुकुन्दरा हिल्स के शैलकियों आदि मानव द्वारा उकेरी गई रेखायें मिलती है।

वन्य जीव अभ्यारण्य – 26

1. सारिस्का वन्य जीव अभ्यारण्य

यह अभयारण्य अलवर जिले में स्थित है। 1900 में इसकी स्थापना की गई। 1955 में इसे वन्य जीव अभ्यारण्य का दर्जा दिया गया।1978-79 में यहां टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट शुरू किया गया। यह राजस्थान का दुसरा टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट है।यह अभयारण्य हरे कबूतरों के लिए प्रसिद्ध है।

इस अभ्यारण्य में क्रासका व कांकनबाड़ी पठार, भृतहरि, नीलकठ महादेव मन्दिर, पाण्डुपोल, तालवृक्ष, नेडा की छतरियां, नारायणी माता मन्दिर सरिस्का पैलेस होटल, RTDC का टाइगर डेन होटल स्थित है।

2. सरिस्का अ, अलवर – सबसे छोटा अभयारण्य।

3. राष्ट्रीय मरू उद्यान

यह जैसलमेर और बाड़मेर में स्थित है।यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राज. का सबसे बड़ा अभ्यारण्य है।इसकी स्थापना वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अर्न्तगत सन् 1980-81 में की गई। इस अभयारण्य में करोड़ों वर्ष पुराने काष्ठ काष्ठावशेष, डायनोसोर के अण्डे के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इन अवशेष को सुरक्षित रखने के लिए अभयारण्य के भीतर अकाल गांव में ‘फॉसिल्स पार्क’ स्थापित किया गया हैं । यह अभयारण्य आकल वुड फॉसिल्स पार्क के कारण प्रसिद्ध हैं। गोडावन,चिंगारा, काले हिरण, लोमड़ी, एण्डरसन्स टाड, गोह, मरू बिल्ली पीवणा, कोबरा, रसलवाईपर आदि इसमें मिलते हैं।

4.सीतामाता अभ्यारण्य

यह चितौड़गढ़ प्रतापगढ़ और उदयपुर में स्थित है। 1971 में इसकी स्थापना हुई। यह अभयारण्य उड़न गिलहरी लिए प्रसिद्ध है।इस अभयारण्य में स्थित लव-कुश जलस्त्रोंतों से अनंत काल से ठण्डी व गर्म जल धाराएं प्रवाहीत हो रही हैं। जाखम बांध इसी अभ्यारण्य में स्थित है।

5. कुम्भलगढ़- अभयारण्य

यह उदयपुर- पाली, राजसमंद जिले में है। 1971 में इसकी स्थापना की गई। यह अभयारण्य भेडीये के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। यहां भेडि़या, रीछ, मुर्गे, चैसिंगा(घटेल) मिलते हैं। इस अभ्यारण्य में चंदन के वृक्ष भी मिलते हैं। रणकपुर के जैन मन्दिर इसी अभयारण्य है।

6. चंबल घड़ीयाल-अभयारण्य

यह अभयारण्य चंबल नदी में बनाया गया है जो राणाप्रताप सागर से यमुना नदी तक विस्तृत(कोटा, बूंदी, स. माधोपुर, धौलपुर, करौली) है। यह एकमात्र अन्र्तराज्जीय(राज., म. प्रदेश, उ. प्रदेश) अभयारण्य है। चंबल देश की एकमात्र नदी सेन्चुरी है। इसे घड़ीयालों का संसार भी कहते हैं । चम्बल नदी में डाल्फिन मछली भी पाई जाती हैं। जिसे ‘गांगेय सूस’ कहते हें।

7.तालछापर अभ्यारण्य – चुरू

इस अभ्यारण्य में काले हिरणों को संरक्षण दिया है। तालछापर अभ्यारण्य को प्रवासी पक्षी “कुंरजा” की शरण स्थली कहा जाता है।

8. भैंसरोडगढ़, चितौडगढ

घड़ीयालों के लिए प्रसिद्ध

9. बस्सी, चितौड़गढ़

10. माऊण्ट आबू अभयारण्य – सिरोही

जंगली मुर्गे के लिए प्रसिद्ध, गुरूशिखर इसी अभयारण्य में है।

11. सवाई मानसिंह, सवाई माधोपुर

12. कैला दैवी

यह करौल में स्थित हैं। यहां देववन (ओरण) भी हैं।

13. फुलवारी की नाल, उदयपुर

सोम का उद्गम, टीक के वृक्ष का प्रथम Human Anatomy park.

14. टाडगगढ़ रावली

यह अजमेर,पाली व राजसमन्द में फैला हुआ हैं। यहां एक किला भी हैं, जिसे टाड़गढ़ का किला कहते हैं, जो अजमेर में हैं। इस किले का निर्माण कर्नल जेम्स टॉड ने करवाया था। यहां स्वंतत्रता आंदोलन के समय राजनैतिक कैदियों को कैद रखा जाता था। विजयसिंह पथिक उर्फ भूपसिंह को इसमें कैद रखा गया था।

15. रामगढ़ विषधारी, बूंदी

मेज नदी निकलती है, राज. का एक मात्र ऐसा अभयारण्य जिसमे बाघ परियोजना के अलावा बाघ मिलते है। यह बूंदी के शासकों का आखेट क्षेत्र था।

16. जमवा रामगढ़, जयपुर

17. बंधबरैठा अभयारण्य

यह भरतपुर में स्थित हैं। यह केवलादेव अभयारण्य का हिस्सा हैं। इसमें बया पक्षी सर्वांधिक पाया जाता हैं।बारैठा झील, परिन्दों का घर

18. जवाहर सागर

यह अभयारण्य कोटा,चितौड़गढ़,बूंदी में है। घड़ीयालों का प्रजनन केन्द्र, मगरमच्छ, गैपरनाथ मन्दिर, गडरिया महादेव, कोटा बांध इसी में है।

19. शेरगढ़ अभयारण्य

यह बांरा में स्थित हैं। परवन नदी गजरती है, शेरगढ़ दुर्ग, सांपों की संरक्षण स्थली, चिरौजी के वृक्ष मिलते है। यहां पर सर्प उद्यान भी हैं।

20. जयसमंद, उदयपुर

बघेरों के लिए प्रसिद्ध, इसे जलचरों की बस्ती कहते हैं। रूठी रानी का महल इसी में है।

21. नाहरगढ़, जयपुर

चिकारा के लिए प्रसिद्ध, राज्य का प्रथम देश का दुसरा जैविक उद्यान, राज्य का पहला देश का तिसरा बियर रेस्क्यू सेंटर बनाया गया है।

22. रामसागर, धौलपुर

23. केसरबाग, धौलपुर

24. वनविहार, धौलपुर – सांभर, सारस

25. दर्रा वन्य जीव अभ्यारण्य -कोटा, झालावाड़

26. सज्जनगढ़, उदयपुर

आखेट निषेध क्षेत्र – 33

    बागदड़ा – उदयपुर

    बज्जु – बीकानेर

    रानीपुरा -टोंक

    देशनोक – बीकानेर

    दीयात्रा – बीकानेर

    जोड़ावीर – बीकानेर

    मुकाम – बीकानेर

    डेचुं – जोधपुर

    डोली – जोधपुर -काले हिरण के लिए

    गुढ़ा – बिश्नोई – जोधपुर

    जम्भेश्वर – जोधपुर

    लोहावट – जोधपुर

    साथीन – जोधपुर

    फिटकाशनी – जोधपुर

    बरदोद – अलवर

    जौड़ीया – अलवर

    धोरीमन्ना – बाड़मेर

    जरोंदा – नागौर

    रोतू – नागौर

    गंगवाना – अजमेर

    सौंखलिया- अजमेर – गोडावण

    तिलोरा – अजमेर

    सोरसन – बारां – गोडावण

    संवत्सर-कोटसर- चुरू

    सांचैर – जालौर

    रामदेवरा – जैसलमेर

    कंवाल जी – सा. माधोपुर

    मेनाल – चितौड़गढ़

    महलां – जयपुर

    कनक सागर – बूंदी – जलमुर्गो

    जवाई बांध – पाली

    संथाल सागर – जयपुर

    उज्जला – जैसलमेर

देश का पहला गोडावण ब्रीडिंग सेंटर

20 साल बाद फिर से देश में बारां के सोरसन(बारां) को राज्य पक्षी गोडावण से पहचान मिलेगी। देश का पहला गोडावण ब्रीडिंग सेंटर सोरसन वन क्षेत्र में बनेगा। साेरसन में आखिरी गोडावण 1999 में देखा गया था। गोडावण ब्रीडिंग सेंटर के 30 साल के प्रोजेक्ट पर करीब 30 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। साेरसन में अमलसरा व नियाणा गांव से करीब 3 से 4 किमी की दूरी पर घास के मैदानों में एनक्लोजर बनाया जाएगा।

मृगवन – 7

अशोक विहार, जयपुर

चितौड़गढ़ मृगवन, चितौड़गढ़

पुष्कर मृगवन, पुष्कर

संजय उद्यान – शाहपुरा (जयपुर)

सज्जनगढ़, उदयपुर – राज्य का दुसरा जैविक उद्यान

अमृता देवी, खेजड़ली – भाद्रपद शुक्ल दशमी को मेला

माचिया सफारी पार्क, जोधपुर – यहां देश का पहला मरू वानस्पतिक उद्यान किया जा रहा है।

जैविक उद्यान – 2

नाहरगढ़, जयपुर- प्रथम

सज्जनगढ़, उदयपुर

जन्तुआलय – 5

जयपुर(1876) – सबसे पुराना, रामनिवास बाग में स्थित रामसिंह द्वारा स्थापित, मगरमच्छ और बाघ प्रजनन केन्द्र

उदयपुर(1878) – गुलाब बाग, बाघ, बघेरा, भालु

बीकानेर(1922) – सार्वजनिक उद्यान, वर्तमान में बंद

जोधपुर(1936) – उम्मेद बाग, पक्षियों के लिए प्रसिद्ध गोडावन का कृत्रिम प्रजनन केन्द्र कोटा(1954)

कोटा – 1954 में स्थापित

कन्जर्वेशन रिजर्व – 10

बीसलपुर कन्जर्वेशन रिजर्व – टोंक

जोडबीड गढ़वाला कन्जर्वेशन रिजर्व – बीकानेर

सुन्धामाता कन्जर्वेशन रिजर्व – जालौर, सिरोही

गुढ़ा विश्नोईयान कन्जर्वेशन रिजर्व – जोधपुर

शाकम्भरी कन्जर्वेशन रिजर्व – सीकर, झुझुनू

गोगेलाव कन्जर्वेशन रिजर्व – नागौर

बीड़ कन्जर्वेशन रिजर्व – झुझूनू

रोटू कन्जर्वेशन रिजर्व – नागौर

उम्मेदगंज पक्षी विहार कन्जर्वेशन रिजर्व – कोटा

जवाईबांध कन्जर्वेशन रिजर्व – पाली

तथ्य

खींचन, जोधपुर का एक गांव है जहां शती काल में रूस व यूक्रेन से प्रवासी पक्षी कुरंजा आता है। कुरंजा एक विरह गीत भी है।

राज्य सरकार इनके नाम से कैलाश सांखला वन्य जीव पुरसकार देती है।

गजनेर(बीकारने), बटबड़ या रेज का तीतर (इंपीरियल सेन्डगाउज) के लिए प्रसिद्ध है।

डोलीधावा जोधपुर का एक गांव है। जो काले मृगों के लिए संरक्षित है।

उतर भारत का प्रथम सर्प उद्यान, कोटा।

गोडावण – ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, सोहन चिडि़या, हुकना, गुधनमेर क्रायोटीस नाइगीसैप्स(विज्ञान) कहते है। यह जैसलमेर, सांखलिया(अजमेर), सोरसन(बारा) में मिलता है। 1981 में इसे राज्य पक्षी का दर्जा दिया गया।

राष्ट्रीय स्तर पर 94 राष्ट्रीय उद्यान, 501 अभयारण्य, 14 बायोस्फीयर रिजर्व है।

भारत में सर्वप्रथम 1887 में वन्य पक्षी सुरक्षा अधिनियम बनाया गया।

दश् में बाघों के लिए अप्रैल 1973 में बाघ परियोजना शुरू की गई।

दशे में अब तक 28 बाघ अभयारण्य है। राजस्थान में दो(रणथम्भौर, सरिस्का), सर्वाधिक मध्यप्रदेश में है।

हरे कबूतर सरिस्का, अजमेर, तिलोरा गांव पुष्कर, थावंला गांव नागौर में मिलते है।

गेेडवेल – जीय बतख है जो रूस चन और यरोप से शीतकाल में अजमेर के आस-पास आती है।

ताली अभ्यारण्य करौली और बीसलपुर अभ्यारण्य टोंक में स्थापित किये जा रहे है।

सर्वाधिक वन्य जीव अभ्यारण्य उदयपुर में सर्वाधिक आखेट निषेध क्षेत्र, जोधपुर में है।

राजस्थान बजट घोषणा 2013 के अन्तर्गत पक्षी अभ्यारण्य स्थापित किया जायेगा – “बड़ोपल पक्षी अभ्यारण्य ” – हनुमानगढ़ जिले की पीलीबंगा तहसील के गांव बड़ोपल में। बड़ोपल गांव विदेशीपक्षियों की शरण स्थली के रूप में प्रसिद्ध है।

किस जिले में सर्वाधिक वन्य जीव अभयारण्य है ? – उदयपुर

किस जिले में सर्वाधिक आखेट निषिद्ध क्षेत्र है ? – जोधपुर

राजस्थानका प्रथम राष्ट्रीय उद्यान – रणथंबौर राष्ट्रीय उद्यान (1 नवम्बर 1980)

राजस्थानका दूसरा राष्ट्रीय उद्यान – केवलादेव घना (1981)

विश्व धरोहर के रूप में घोषित अभयारण्य – केवलादेव घना पक्षी विहार (1985)

राजस्थानका पहला बाघ परियोजना क्षेत्र/टाईगर प्रोजेक्ट – रणथंभौर (1974)

राजस्थान का दूसरा बाघ परियोजना क्षेत्र/टाईगर प्रोजेक्ट – सरिस्का (1978)

एशिया की सबसे बड़ी पक्षी प्रजनन स्थली – केवलादेव घना पक्षी विहार

राजस्थान के 2 राष्ट्रीय उद्यान – रणथंभौर व केवलादेव घना

राजस्थान के 2 बाघ परियोजना क्षेत्र/टाईगर प्रोजेक्ट – रणथंभौर व सरिस्का

राज्यपक्षी गोडावन के संरक्षण हेतु प्रसिद्ध दो आखेट निषिद्ध क्षेत्र – सोरसन (बारां),सोंखलिया (अजमेर)

सबसे बड़ा आखेट निषिद्ध क्षेत्र – संवत्सर-कोटसर (बीकानेर)

सबसे छोटा आखेट निषिद्ध क्षेत्र -सैथलसागर (दौसा)

साथीन व ढेंचू है – जोधपुर जिले में स्थित आखेट निषिद्ध क्षेत्र

आकल वुड फासिल पार्क/आकल जीवाश्म क्षेत्र ? जैसलमेर

अभयारण्य – स्थापना – क्षेत्रफल (वर्ग किमी)

सरिस्का – 7 नवंबर 1955 – 860रणथंभौर – 1 नवंबर 1960 – 392सीतामाता – 1979 – 423राष्ट्रीय मरू उद्यान – 8 मई 1981 -3162

केवलादेव घना पक्षी विहार/केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान का क्षेत्रफल है – 28.73 वर्ग किमी

सीतामाता अभयारण्य में पाईजाने वाली प्रमुख वृक्ष प्रजातियां – सागवान-बांस-महुआ

रणथंभौर को वर्ष 1974 में तथा सरिस्का को वर्ष 1978 में राष्ट्रीय बाघ परियोजना में शामिल किया गया/टाईगर रिजर्व घोषित किया गया।

टाईगर प्रोजेक्ट में शामिल भारत की सबसे छोटी बाघ परियोजना है ? – रणथंभौर

सीतामाता अभयारण्य किन दो जिलों में विस्तृत है – प्रतापगढव उदयपुर

सीतामाताअभयारण्य का अधिकांशक्षेत्र प्रतापगढ जिले में आता है।

जलीय पक्षियों की प्रजनन स्थली के रूप में प्रसिद्ध अभयारण्य है – चंबल अभयारण्य

राजस्थान में वन्य जीवों के संरक्षण की शुरूआत कब हुई – 7 नवम्बर 1955 को

राजस्थान में सर्वप्रथम 7 नवम्बर 1955 को घोषित वन्य जीव आरक्षित क्षेत्र – वन विहार, सरिस्का व दर्रा

राजस्थान के कितने प्रतिशत क्षेत्र पर राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभयारण्य विस्तृत है – 2.67 प्रतिशत

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972राजस्थान में कब लागू हुआ – 1973 को

भारत में बाघ परियोजना के जनक माने जाते है – कैलाश सांखला

वन्य जीवों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का देश में स्थान है ? दूसरा

राज्य पशु चिंकारा (चैसिंगा) की सर्वाधिक संख्या – सीतामाता अभयारण्य

सागवानवनों की अधिकता ? सीतामाताअभयारण्य

राज्य पक्षी गोडावन – राष्ट्रीय मरू उद्यान

उड़न गिलहरी – सीतामाता अभयारण्य

जंगली मुर्गे – मा. आबू अभयारण्य

आकल काष्ठ जीवाश्म पार्क – राष्ट्रीय मरू उद्यान

क्षेत्रफलानुसार सबसे बड़ा – राष्ट्रीय मरू उद्यान (3162 वर्गकिमी)

प्रथमजैविक पार्क – नाहरगढ अभयारण्य

कृष्ण मृग एवं कुरजां पक्षी- तालछापर अभयारण्य

भारतीयबाघों का घर ? रणथंभौर

सर्वाधिक वन्य जीव- रणथंभौर

मोर का सर्वाधिक घनत्व ? सरिस्का

दुर्लभ औषधीय वन क्षेत्र – सीतामाता अभयारण्य

हरे कबूतर ?सरिस्का

चंदन के वृक्ष – कुंभलगढ अभयारण्य

बटबड़ पक्षी/इंपिरीयल सेंट ग्राउज – गजनेर अभयारण्य

सांपों का संरक्षणस्थल – शेरगढ अभयारण्य

सर्वाधिक जैव विविधता – दर्रा वन्य जीव अभयारण्य

धोंकड़ा वन – दर्रा व रामगढ विषधारी

भेडि़याव जंगली धूसर मुर्गे – कुंभलगढ अभयारण्य

गागरोनी तोते – दर्रा वन्य जीव अभयारण्य

चीतल की मातृभूमि – सीतामाता अभयारण्य

खस नामक घास – जमुवा रामगढ अभयारण्य

मोथियाघास व लाना झाडि़यों हेतु प्रसिद्ध – तालछापर अभयारण्य

क्षेत्रफल कीदृष्टि से राष्ट्रीय मरू उद्यान के बाद राजस्थन के तीन सबसे बड़े अभयारण्य (क्रमशः)- सरिस्का-कैलादेवी-कुंभलगढ

क्षेत्रफल की दृष्टि से दो सबसे छोटे अभयारण्य – तालछापर-सज्जनगढ

रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान मेंक्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय स्थापित किया गया है।

गंगानगर-हनुमानगढ-सीकर-झुंझुनू-डूंगरपुर-बांसवाड़ा-भीलवाड़ा आदि जिलों में कोई भी अभयारण्य या आखेट निषिद्ध क्षेत्र नहीं है।

रणथंभौर व सरिस्का के अलावा किस अभयारण्य में बाघ विचरण करते है – रामगढ विषधारी अभयारण्य बूंदी में राजस्थान का सबसे पहला व सबसे प्राचीन जंतुआलय – जयपुर जंतुआलय (1876)

कौनसा जंतुआलय अपनी पक्षी शाला के लिए प्रसिद्ध है ? जोधपुर

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