Daily Current Affairs

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UPSC Prelims 2021 Test Series


Daily Current Affairs – Hindi


चन्द्रमा, पूर्व अनुमानों से अधिक धात्विक: नासा शोध अध्ययन


(NASA research says the Moon is more metallic than thought before)

नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर’ (Lunar Reconnaissance Orbiter- LRO) अंतरिक्षयान ने चंद्रमा के अध्ययन के दौरान कुछ नए साक्ष्य प्राप्त किये हैं, इसके अनुसार चंद्रमा की निचली सतह में लौह तथा टाइटेनियम जैसी धातुओं की मात्रा, इससे पहले आंकी गयी मात्रा से काफी अधिक है।

चंद्रमा की निचली सतह पर इस धात्विक वितरण को LRO पर स्थापित मिनिचुर रेडियो फ्रीक्वेंसी (Miniature Radio Frequency– Mini-RF) उपकरण द्वारा देखा गया है।

Mini-RF के निष्कर्षों को LRO के वाइड-एंगल कैमराजापान के कगुया मिशन (Kaguya mission) तथा नासा के लूनर प्रॉस्पेक्टर अंतरिक्ष यान से निर्मित धातु ऑक्साइड मानचित्र द्वारा पुष्टि की गयी है।

इसकी खोज किस प्रकार हुई?

इसकी खोज, LRO के Mini-RF उपकरण द्वारा चंद्रमा के उत्तरी गोलार्ध में स्थित क्रेटरों की सतह पर मिट्टी में विद्युतीय गुण (electrical property) का परीक्षण करने के दौरान हुई।

इस विद्युतीय गुण को पारद्युतिक स्थिरांक (dielectric constant) कहा जाता है, तथा यह किसी धातु की विद्युत पारगम्यता (electric permeability) का निर्वात में विद्युत पारगम्यता का अनुपात होता है।

ये पारद्युतिक गुण, धात्विक खनिजों की सांद्रता से प्रत्यक्षतः संबंधित होते है।

सर्वेक्षण के दौरान, क्रमिक रूप से 5 किमी व्यास के आकार तक बड़े क्रेटरों में पारद्युतिक गुणों के स्तर में सापेक्षिक रूप से वृद्धि पायी गयी। इससे बड़े आकार के क्रेटर में पारद्युतिक स्थिरांक (dielectric constant) का मान सामान पाया गया।

इन निष्कर्षों ने संभावना को जन्म दिया कि, बड़े क्रेटरों में पारद्युतिक स्थिरांक में वृद्धि होने का कारण, उल्काओं द्वारा इन बड़े क्रेटरों का निर्माण के दौरान चंद्रमा की सतह के नीचे से लौह तथा टैटेनियम ऑक्साइड युक्त धूल का उपरी सतह पर आ जाना है।

चंद्रमा का निर्माण

चंद्रमा के निर्माण से सबंधित सबसे प्रचलित सिद्धांत यह है, कि लगभग 4.5 बिलियन वर्ष पूर्व मंगल ग्रह के आकार का एक आदि-ग्रह (Proto–planet) पृथ्वी निर्माण के आरंभिक काल में ही पृथ्वी से टकरा गया, परिणामस्वरूप पृथ्वी का एक टुकड़ा विखंडित होकर इसका उपग्रह बन गया।

इस परिकल्पना के पक्ष में पर्याप्त साक्ष्य मिलते है, जैसे कि चन्द्रमा तथा पृथ्वी की रासायनिक संरचना में लगभग समानता, आदि।

इन निष्कर्षों के निहितार्थ:

हमें ज्ञात है, कि पृथ्वी की पर्पटी में चंद्रमा की अपेक्षा लौह ऑक्साइड की मात्रा काफी कम पायी जाती है, वैज्ञानिक इसका कारण समझने का प्रयास कर रहे हैं।

अब, चंद्रमा पर धातु की अधिक मात्रा की नई खोज ने वैज्ञानिकों के काम को और भी कठिन बना दिया है। इससे, चंद्रमा-निर्माण संबधित परिकल्पनाओं की सत्यता पर प्रश्न-चिन्ह लगता है।

इसका एक संभावित कारण यह हो सकता है कि चंद्रमा का निर्माण पृथ्वी की निचली सतह की सामग्री से हुआ हो, अथवा हाल ही में चंद्रमा पर पायी गयी धातुओं की उपस्थिति,चंद्रमा की पिघली हुई सतह के धीरे-धीरे ठंडा होने का परिणाम हो सकती है।

लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO)

LRO नासा का एक रोबोटिक अंतरिक्षयान है जो वर्तमान में चंद्रमा की परिक्रमा करते समय चित्रों के माध्यम से डेटा एकत्र करता है और चंद्रमा की सतह का अध्ययन करता है।

इसे भविष्य के मानव-युक्त चन्द्र मिशन तथा मंगल मिशन संबंधी तैयारियों के क्रम में ‘लूनर प्रीकर्सर एंड रोबोटिक प्रोग्राम’ (Lunar Precursor and Robotic Program– LPRP) के अंतर्गत निर्मित किया गया है।

LRO, नासा के `न्यू विज़न फ़ॉर स्पेस एक्सप्लोरेशन के अंतर्गत पहला मिशन है।

LRO के उद्देश्य

  1. चंद्रमा पर संभावित संसाधनों की पहचान
  2. चंद्रमा की सतह का विस्तृत मानचित्रण
  3. चंद्रमा के विकिरण स्तरों पर डेटा संकलन
  4. भविष्य के चन्द्र मिशनों हेतु चंद्रमा के धुर्वीय क्षेत्रों का अध्ययन।

ICAR और NICRA

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of agricultural research- ICAR) भारत में कृषि शिक्षा और अनुसंधान के समन्वय हेतु एक स्वायत्त निकाय है।

यह कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग, कृषि मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

केंद्रीय कृषि मंत्री इसके अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।

यह विश्व में कृषि अनुसंधान और शिक्षा संस्थानों का सबसे बड़ा नेटवर्क है।

जलवायु परिवर्तनशील कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (National innovations of climate resilient agriculture- NICRA) को 2011 में ICAR द्वारा शुरू किया गया है।

कृषि विज्ञान केंद्र (KVK)

(Krishi Vigyan Kendra)

कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा किसानों के मध्य प्रमुख कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।

इस योजना को ICAR के तहत शत-प्रतिशत केंद्रीय वितपोषण के ज़रिये संचालित किया जा रहा है।

  1. कृषि विज्ञान केंद्र सामान्यतः एक स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय के साथ संबद्ध होता है।
  2. इसका उद्देश्य कृषि अनुसंधान और व्यावहारिक स्थानीय पद्धतियों को लागू करना है।

करण- 4 (Karan- 4)

यह गन्ने की एक नयी किस्म है, इस प्रजाति में चीनी की अधिक मात्रा प्राप्त होती है।

उत्तर प्रदेश में गन्ने की उगाई जाने वाली पारंपरिक किस्मों की जगह ले ली है।

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